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ईद पर श्रीनगर की जामा मस्जिद बंद, उमर बोले भरोसा जरूरी; महबूबा ने पूछा- इबादतगाह पर ताला क्यों?
आज देशभर में ईद-उल-अजहा का त्योहार पूरे उत्साह और धार्मिक श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है, लेकिन श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद इस बार भी बंद रही। लगातार सातवें साल इस प्रमुख इबादतगाह में ईद की नमाज अदा नहीं हो सकी। प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए मस्जिद को बंद रखने का निर्णय लिया, लेकिन इस पर कश्मीर की सियासत गरमा गई है।
धार्मिक आज़ादी पर सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने इस फैसले पर नाराज़गी जताई है। उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट कर कहा, “जब तक सरकार अपने ही लोगों पर भरोसा नहीं करेगी, तब तक हालात सामान्य नहीं कहे जा सकते। ईद जैसे बड़े दिन पर मस्जिद को बंद रखना यह दिखाता है कि अब भी कश्मीरियों को संदेह की नज़र से देखा जा रहा है।”
वहीं पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने प्रशासन से सवाल किया, “अगर पूरे देश में मस्जिदें खुली हैं और लोग शांतिपूर्वक त्योहार मना रहे हैं, तो श्रीनगर की जामा मस्जिद पर ही ताला क्यों? क्या कश्मीरियों को अपनी आस्था का पालन करने का हक नहीं है?”
प्रशासन की दलील
प्रशासन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि श्रीनगर में कुछ असामाजिक तत्व त्योहार का फायदा उठाकर माहौल खराब करने की कोशिश कर सकते हैं। इसी खतरे को देखते हुए एहतियातन जामा मस्जिद को बंद किया गया है। शहर के अन्य इलाकों में मस्जिदों में नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी, लेकिन जामा मस्जिद जैसे संवेदनशील स्थानों पर सख्ती बरती गई।
जनता की मिली-जुली प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों में इस फैसले को लेकर नाराजगी देखी गई। कई लोगों ने कहा कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है, जबकि कुछ ने प्रशासन के फैसले को सुरक्षा के लिहाज से उचित बताया। हबीब नामक एक स्थानीय निवासी ने कहा, “हर साल यही कहानी दोहराई जाती है। हम बस शांतिपूर्वक नमाज अदा करना चाहते हैं। मस्जिद में ताला देखना हमारे दिल को दुख देता है।”
सियासी मुद्दा या संवेदनशीलता?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना कश्मीर में सामान्य स्थिति की बहस को फिर से जीवित कर देती है। जहां एक ओर सरकार घाटी में स्थिरता और शांति की बात कर रही है, वहीं धार्मिक स्थलों पर प्रतिबंध इस दावे पर सवाल खड़े करते हैं।
निष्कर्ष
ईद का पर्व मेल-जोल और भाईचारे का प्रतीक है, लेकिन श्रीनगर की जामा मस्जिद का बंद रहना इस बात की याद दिलाता है कि कश्मीर में हालात अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हैं। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और अधिकार से जुड़ा एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि कश्मीर की राजनीति में धार्मिक स्वतंत्रता अब भी एक प्रमुख मुद्दा बनी हुई है।

