पिता की हत्या से आंदोलन की राह तक, दिशोम गुरु शिबू सोरेन के मुख्यमंत्री बनने की संघर्षपूर्ण कहानी पढ़ें

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पिता की हत्या से आंदोलन की राह तक, दिशोम गुरु शिबू सोरेन के मुख्यमंत्री बनने की संघर्षपूर्ण कहानी पढ़ें

शिबू सोरेन, जिन्हें आदिवासी समाज में “दिशोम गुरु” के नाम से जाना जाता है, भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने अपने जीवन के कठिन संघर्षों को मात देकर एक नई राह बनाई। उनका जीवन केवल एक राजनेता की कहानी नहीं, बल्कि एक आंदोलनकारी, समाजसेवी और आदिवासियों की आवाज़ बनने की प्रेरक यात्रा है।

बचपन और पिता की हत्या

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के बोकारो जिले के नेमरा गाँव में हुआ था। वे एक सामान्य आदिवासी परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता, सोबरा सोरेन, आदिवासियों की ज़मीन पर अवैध कब्जा करने वालों के खिलाफ़ आवाज़ उठाते थे। इस सामाजिक अन्याय के खिलाफ उनके प्रयासों के कारण ही उनकी हत्या कर दी गई।

पिता की इस क्रूर हत्या ने शिबू सोरेन के जीवन की दिशा ही बदल दी। उस समय वे पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन इस दुखद घटना ने उनमें क्रांति की चिंगारी जला दी। उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और अन्याय के खिलाफ़ लड़ने की ठानी।

संघर्ष और आंदोलन की शुरुआत

शिबू सोरेन ने 1960 के दशक में ज़मीन और जंगल की लड़ाई को लेकर आदिवासी जागरूकता आंदोलन की शुरुआत की। उन्होंने ‘संथाल परगना आंदोलन’ को गति दी और झारखंड के आदिवासियों के हक़ के लिए कई मोर्चों पर नेतृत्व किया। ज़मींदारों और बाहरी प्रभाव से आदिवासियों की ज़मीन को बचाने के लिए उन्होंने न केवल संघर्ष किया, बल्कि हजारों लोगों को संगठित कर एक सामाजिक चेतना पैदा की।

इसी दौरान उन्हें “दिशोम गुरु” की उपाधि दी गई, जिसका अर्थ होता है — “जनजातीयों का मार्गदर्शक।” इस उपाधि ने उन्हें न सिर्फ़ आदिवासियों का नेता बना दिया, बल्कि उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दी।

राजनीति में प्रवेश और मुख्यमंत्री बनना

शिबू सोरेन ने 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। इस दल का उद्देश्य झारखंड को एक अलग राज्य का दर्जा दिलाना था। उन्होंने इस मकसद को लेकर कई वर्षों तक आंदोलन किया। 2000 में झारखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला, जो उनके वर्षों के संघर्ष की जीत थी।

2005 में शिबू सोरेन पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। हालांकि उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं चला, लेकिन यह एक ऐतिहासिक पल था, जब एक साधारण आदिवासी किसान का बेटा, जो अपने पिता की हत्या से टूटा नहीं, बल्कि लड़ा — मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा।

उनसे जुड़ी रोचक बातें

  • शिबू सोरेन जेल भी गए, उन पर कई आरोप लगे लेकिन उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ी और राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखी।

  • उन्होंने संसद में भी कई बार झारखंड की आवाज़ उठाई और आदिवासी हितों को प्राथमिकता दी।

  • उनका सादा जीवन और स्पष्ट वक्तव्य आज भी उन्हें जनता से जोड़ता है।

निष्कर्ष

शिबू सोरेन की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरे संघर्ष की प्रतीक है, जो न्याय, अधिकार और स्वाभिमान के लिए लड़ा गया। उन्होंने दिखा दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो विपरीत हालात भी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकते।


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