तमिलनाडु राज्यपाल पर विवाद: “जय श्री राम” के नारे पर डीएमके ने उठाए सवाल, धर्मनिरपेक्षता पर खतरे की बात कही

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तमिलनाडु राज्यपाल पर विवाद: “जय श्री राम” के नारे पर डीएमके ने उठाए सवाल, धर्मनिरपेक्षता पर खतरे की बात कही

तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि एक बार फिर विवादों में घिर गए हैं। इस बार कारण बना है मदुरै के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम, जहां राज्यपाल द्वारा छात्रों से “जय श्री राम” का नारा लगवाया गया। इस घटना के सामने आने के बाद राजनीतिक माहौल गर्मा गया है। विशेष रूप से डीएमके (DMK) ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है और राज्यपाल पर संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के उल्लंघन का आरोप लगाया है।

डीएमके प्रवक्ता धरनीधरन ने कड़ी आलोचना करते हुए कहा, “यह देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के खिलाफ है। राज्यपाल पद की गरिमा का बार-बार हनन हो रहा है। क्या राज्यपाल यह भूल चुके हैं कि भारत का संविधान किसी भी धर्म को प्राथमिकता नहीं देता?” उन्होंने आरोप लगाया कि आर.एन. रवि का यह कदम दक्षिण भारत में एक खास विचारधारा को थोपने का प्रयास है, जिसे तमिलनाडु की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी।

राज्यपाल आर.एन. रवि पहले भी कई बार राज्य सरकार के साथ मतभेदों को लेकर चर्चा में रहे हैं। उनकी राजनीतिक गतिविधियाँ और बयान अक्सर डीएमके सरकार के रुख के विपरीत जाते नजर आए हैं। अब “जय श्री राम” के नारे को लेकर उठा विवाद केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक टकराव का रूप ले चुका है, जिसमें केंद्र बनाम राज्य, हिंदुत्व बनाम धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दे भी जुड़ते जा रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तमिलनाडु की सियासत में दो धड़े साफ दिखाई दे रहे हैं। एक ओर भाजपा और दक्षिणपंथी संगठन राज्यपाल के इस कदम को भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा से जुड़ा बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर डीएमके, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे संविधान के विरुद्ध बता रहे हैं। कुछ संगठनों ने इसे “राजभवन से भगवाकरण की ओर पहला कदम” करार दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों को राजनीतिक या धार्मिक गतिविधियों से दूर रहना चाहिए। भारत का संविधान यह सुनिश्चित करता है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा, और सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता होगी। ऐसे में यदि कोई संवैधानिक पदाधिकारी सार्वजनिक मंच से धार्मिक नारे लगवाता है, तो यह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए भी घातक हो सकता है।

हालांकि राज्यपाल कार्यालय की ओर से अब तक कोई आधिकारिक सफाई नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गहराएगा। डीएमके ने संकेत दिए हैं कि वह इस मामले को राष्ट्रपति और केंद्र सरकार के सामने भी उठाएगी।

तमिलनाडु की राजनीति में यह विवाद एक और अध्याय जोड़ता है, जो न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय बहस को भी प्रभावित कर सकता है। अब देखना होगा कि यह मामला संवैधानिक दायरे में कैसे सुलझता है, या फिर यह एक और लंबी सियासी खींचतान की शुरुआत बनता है।


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