संसद बनाम सुप्रीम कोर्ट बयान पर घमासान: कांग्रेस ने भाजपा पर न्यायपालिका को कमजोर करने का लगाया गंभीर आरोप
भारतीय लोकतंत्र की तीनों प्रमुख संस्थाओं—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच संतुलन बनाए रखना संविधान की मूल आत्मा है। हाल ही में इस संतुलन को लेकर एक बार फिर सियासी घमासान शुरू हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद निशिकांत दुबे के एक बयान ने राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है। उन्होंने कहा, “अगर कानून बनाना सुप्रीम कोर्ट का ही काम रह गया है, तो फिर संसद भवन को बंद कर देना चाहिए।” इस बयान को लेकर कांग्रेस ने कड़ी आपत्ति जताई है और भाजपा पर सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था को जानबूझकर निशाना बनाने और उसे कमजोर करने का आरोप लगाया है।
कांग्रेस प्रवक्ताओं ने भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब भाजपा नेताओं ने न्यायपालिका की गरिमा पर सवाल उठाए हों। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता में लगातार हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का मानना है कि यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है क्योंकि अगर न्यायपालिका पर जनता का विश्वास डगमगाता है, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो सकती हैं।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, “भाजपा सरकार बार-बार न्यायपालिका के फैसलों पर सवाल उठाकर यह संकेत देती है कि वह केवल वही निर्णय स्वीकार करेगी जो उसके पक्ष में हो। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि निशिकांत दुबे का बयान एक सत्ताधारी दल के सांसद के लिए शोभा नहीं देता और इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा आघात होता है।
कांग्रेस ने इस पूरे प्रकरण को लेकर लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति से भी अपील की है कि वे ऐसे बयानों पर संज्ञान लें और इस तरह की भाषा की निंदा करें जो संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं के बीच चल रही खींचतान का बड़ा संकेत छिपा हुआ है। भाजपा और उसके सहयोगी जहां न्यायपालिका पर ‘अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने’ का आरोप लगाते हैं, वहीं विपक्ष इसे सरकार की अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति करार देता है।
देश में पहले भी कई बार विधायिका और न्यायपालिका के बीच मतभेद सामने आ चुके हैं, लेकिन उन्हें आपसी संवाद और संवैधानिक मर्यादाओं के तहत सुलझाया गया। इस बार भी आवश्यकता है कि दोनों पक्ष संविधान की भावना को समझें और सार्वजनिक मंचों पर ऐसी टिप्पणियों से बचें जो लोकतंत्र की नींव को हिला सकती हैं।
अंततः यह समझना जरूरी है कि संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों ही लोकतंत्र के स्तंभ हैं। यदि इनमें टकराव की स्थिति बनती है, तो इससे न केवल शासन प्रणाली प्रभावित होती है, बल्कि आम जनता का भरोसा भी डगमगाने लगता है। ऐसे में सभी राजनीतिक दलों को संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखने की दिशा में जिम्मेदारीपूर्वक व्यवहार करना चाहिए।

