गौरव गोगोई के परिवार की नागरिकता पर सरमा का हमला, साबित होने पर सीएम पद छोड़ने का दिया चैलेंज
असम की राजनीति इन दिनों तीखी बयानबाज़ियों और व्यक्तिगत आरोपों के चलते गरमा गई है। राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए उनके परिवार की नागरिकता पर सवाल उठाया है। यह विवाद तब और गहरा गया जब सीएम सरमा ने सार्वजनिक रूप से यह दावा कर दिया कि यदि गौरव गोगोई यह साबित कर दें कि उनके बच्चे भारतीय नागरिक हैं, तो वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे।
हिमंत बिस्वा सरमा का यह बयान राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ ले आया है। उन्होंने कहा कि गोगोई को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके परिवार के सदस्य—विशेष रूप से उनके बच्चे—भारतीय नागरिक हैं या नहीं। सरमा ने यह आरोप ऐसे समय पर लगाया है जब राज्य में आम चुनावों का माहौल गर्म है और राजनीतिक दल एक-दूसरे पर लगातार हमलावर हो रहे हैं।
गौरव गोगोई, जो कि दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे हैं, ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि यह सरमा की बौखलाहट और ध्यान भटकाने की रणनीति है। गोगोई ने कहा कि जब सरकार राज्य के ज्वलंत मुद्दों पर जवाब देने में असफल हो जाती है, तब वह इस तरह के व्यक्तिगत हमलों का सहारा लेती है। उन्होंने मुख्यमंत्री से पूछा कि क्या अब भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र चुनावी बहस का हिस्सा बन चुका है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरमा का यह बयान केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि विपक्ष को निजी स्तर पर नीचा दिखाने की कोशिश भी है। हालांकि, यह भी सच है कि इस तरह के आरोपों से आम जनता का ध्यान मूल मुद्दों जैसे बेरोज़गारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था की समस्याओं से हटता है।
वहीं बीजेपी खेमे में इस बयान को सरमा की “आक्रामक राजनीति” की रणनीति बताया जा रहा है, जो उन्होंने पहले भी कई बार अपनाई है। बीजेपी के नेताओं का कहना है कि यदि गोगोई के पास सबूत हैं तो उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि सच्चाई सबके सामने आ सके। वहीं कांग्रेस का आरोप है कि मुख्यमंत्री जानबूझकर ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के मुद्दे उठा रहे हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद किस दिशा में जाता है। क्या गोगोई इस चुनौती को स्वीकार करते हैं और सबूत पेश करते हैं, या फिर यह मामला केवल मीडिया की सुर्खियों तक ही सीमित रह जाएगा?
जो स्पष्ट है, वह यह कि यह विवाद असम की राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आया है, जिसने व्यक्तिगत और राजनीतिक मर्यादाओं की सीमाओं को धुंधला कर दिया है।

