दादर स्टेशन के बाहर 80 साल पुराने हनुमान मंदिर को रेलवे ने हटाने का नोटिस दिया, उद्धव ठाकरे ने BJP पर उठाया सवाल

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मुंबई के दादर स्टेशन के बाहर स्थित एक 80 साल पुराना हनुमान मंदिर, जिसे स्थानीय लोग श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजते आए हैं, अब खतरे में है। रेलवे प्रशासन ने इस मंदिर को अतिक्रमण बताते हुए उसे हटाने का नोटिस जारी किया है। इस नोटिस के बाद, मंदिर के भक्तों और स्थानीय समुदाय में गहरी निराशा और आक्रोश का माहौल है। इस मुद्दे पर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर हमला करते हुए सवाल उठाया है कि क्या अब BJP शासन में मंदिरों की सुरक्षा भी खतरे में है?

यह मंदिर दादर रेलवे स्टेशन के बाहर स्थित है और लगभग 80 साल पुराना है। स्थानीय लोग इसे एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल मानते हैं, जहां वे नियमित रूप से पूजा अर्चना करते हैं। मंदिर की यह ऐतिहासिकता और महत्व न केवल स्थानीय निवासियों के लिए, बल्कि शहर भर के श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष है। हालांकि, रेलवे प्रशासन ने इसे रेलवे भूमि पर अवैध कब्जा बताते हुए उसे हटाने का आदेश दिया है। रेलवे का तर्क है कि यह मंदिर रेलवे की प्रॉपर्टी पर स्थित है, और इसे हटाना उनके विकास कार्यों के लिए जरूरी है।

इस नोटिस के बाद मंदिर के भक्तों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि इस मंदिर को हटाना न केवल उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन होगा, बल्कि यह एक धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट करने जैसा होगा। वे इसे श्रद्धा और आस्था का केंद्र मानते हैं, और इसे हटाने के खिलाफ खड़े हैं। मंदिर के आसपास रहने वाले लोग भी इस कदम के खिलाफ हैं, और उनका कहना है कि यह मंदिर हमेशा से इस क्षेत्र का हिस्सा रहा है, और इसके हटने से न केवल उनकी धार्मिक भावनाएं आहत होंगी, बल्कि एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर भी समाप्त हो जाएगी।

इस विवाद के राजनीतिक आयाम भी सामने आए हैं। उद्धव ठाकरे ने इस मुद्दे पर BJP सरकार को घेरते हुए सवाल किया है कि क्या अब BJP शासन में मंदिर भी सुरक्षित नहीं हैं? उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर मामला है, जहां सरकारों को धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और सम्मान करना चाहिए, न कि उन्हें अवैध बताकर हटाने की कोशिश करनी चाहिए। उद्धव ठाकरे ने आरोप लगाया कि भाजपा केवल अपने राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे मुद्दों को उठाती है और अब यह साफ हो गया है कि उन्हें धार्मिक स्थलों की कोई परवाह नहीं है। उनका कहना था कि पहले मंदिरों को सम्मान देना चाहिए, और बाद में सरकार को कानून और नियमों की बात करनी चाहिए।

इस मुद्दे पर BJP ने अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन यह मामला राजनीतिक और धार्मिक दृष्टि से और भी जटिल हो सकता है। यह न केवल मुंबई के नागरिकों और श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या रेलवे प्रशासन इस निर्णय को वापस लेता है या फिर मंदिर के भक्तों को इसे हटाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।


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