उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में उठाए तीखे सवाल, FIR में देरी पर जताई गंभीर चिंता
देश के संवैधानिक पदों में से एक महत्वपूर्ण पद संभाल रहे उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े मामले में गंभीर चिंता जताई है। एक महीने पहले जस्टिस वर्मा के आवास से कथित रूप से जले हुए नकदी की बरामदगी के बावजूद अब तक कोई एफआईआर दर्ज न होने पर उन्होंने कड़ा सवाल उठाया है। धनखड़ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हर संज्ञेय अपराध में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है, चाहे आरोपी कोई भी हो, कितना भी बड़ा पदधारी क्यों न हो।”
यह मामला 14-15 मार्च 2025 की रात का है, जब जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जले हुए कैश की बरामदगी की खबर सामने आई। यह घटना कई दिनों तक सार्वजनिक नहीं हुई और लगभग एक हफ्ते बाद इसकी जानकारी सार्वजनिक डोमेन में आई। इसी को लेकर उपराष्ट्रपति ने सवाल उठाया कि ऐसी गंभीर घटना को सामने आने में देरी क्यों हुई और पारदर्शिता कहां है?
उपराष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट की उस तीन सदस्यीय समिति से भी अपील की है जो इस पूरे मामले की आंतरिक जांच कर रही है। उन्होंने आग्रह किया है कि समिति अपनी प्रक्रिया को तेज करे और जल्द निष्कर्ष पर पहुँचे ताकि जनता का विश्वास न्यायपालिका पर बना रहे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि “कानून का शासन तभी सार्थक होगा जब सभी के लिए समान रूप से लागू किया जाए — जज, नेता या आम नागरिक।”
धनखड़ ने यह भी स्पष्ट किया कि जजों के खिलाफ जांच के लिए किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में जवाबदेही और पारदर्शिता लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं। यदि कानून का पालन नहीं किया गया तो यह न केवल व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करेगा, बल्कि आम जनता में भी व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करेगा।
उपराष्ट्रपति का यह बयान उस समय आया है जब देश में न्यायपालिका की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो रही है। सोशल मीडिया और नागरिक समाज में भी इस मामले को लेकर गहरी नाराजगी है। कई संगठनों ने भी इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि इस मामले में निष्पक्ष और त्वरित जांच सुनिश्चित की जाए।
धनखड़ का यह कदम उन लोगों के लिए भी संदेश है जो यह मानते हैं कि उच्च पद पर बैठे लोगों को कानून से ऊपर समझा जाता है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है और अगर न्यायपालिका पर जनता का भरोसा कायम रखना है तो ऐसे मामलों में सख्त और त्वरित कार्रवाई आवश्यक है।
यह बयान न्याय और शासन में पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है, और इससे आने वाले दिनों में जांच प्रक्रिया पर भी असर पड़ने की संभावना है।

