पंडित धीरेन्द्र शास्त्री ने आजतक से बातचीत में वक्फ बोर्ड को समाप्त करने और सनातन बोर्ड के गठन की मांग की
पंडित धीरेन्द्र शास्त्री, जो अपनी धार्मिक और सामाजिक विचारधाराओं के लिए प्रसिद्ध हैं, ने हाल ही में आजतक चैनल से एक खास बातचीत में सनातन धर्म के संरक्षण और प्रचार के लिए एक अहम मुद्दा उठाया। उन्होंने वक्फ बोर्ड के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए सनातन बोर्ड के गठन की मांग की। उनका कहना था कि वक्फ बोर्ड के साथ-साथ अन्य धार्मिक संस्थाओं के मामलों को नियंत्रित करने वाली संस्थाओं के कामकाज में सुधार की आवश्यकता है, और इस संदर्भ में सनातन धर्म के हितों की रक्षा के लिए सनातन बोर्ड का गठन आवश्यक हो गया है।
पंडित शास्त्री का मानना है कि वक्फ बोर्ड का उद्देश्य केवल एक विशेष समुदाय के धार्मिक हितों की रक्षा करना है, जबकि सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए कोई ऐसा बोर्ड या संस्था नहीं है, जो उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आवश्यकताओं की रक्षा कर सके। उन्होंने इस पर भी चिंता व्यक्त की कि सनातन धर्म के अनुयायी, जो पूरे देश में फैले हुए हैं, के लिए कोई ऐसा मंच नहीं है, जो उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा कर सके या उनकी समस्याओं का समाधान कर सके।
पंडित शास्त्री ने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड या अन्य ऐसी संस्थाओं के पास अब तक ऐसे किसी तंत्र का अभाव है, जिससे समान रूप से सभी धर्मों के अनुयायियों के अधिकारों की रक्षा हो सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि सनातन धर्म की सांस्कृतिक धरोहर, धार्मिक स्थलों और मंदिरों की देखरेख के लिए एक अलग बोर्ड की जरूरत महसूस हो रही है, ताकि सनातन धर्म से जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान किया जा सके।
इस दौरान पंडित शास्त्री ने यह भी कहा कि यदि वक्फ बोर्ड के अधिकारों का विस्तार और कार्यक्षेत्र बढ़ाया जा सकता है, तो सनातन धर्म के पालनकर्ताओं के लिए भी एक संस्थागत तंत्र बनाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह बोर्ड ना केवल धार्मिक मामलों को संभालने के लिए होगा, बल्कि इससे धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित की जाएगी। उनके अनुसार, भारत में सनातन धर्म की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए यह कदम बहुत जरूरी है।
पंडित शास्त्री ने इस मुद्दे पर सरकार और अन्य संबंधित संस्थाओं से शीघ्र कार्यवाही की अपील की। उनका कहना था कि इस प्रकार के बोर्ड के गठन से न केवल धार्मिक संतुलन स्थापित होगा, बल्कि इससे समाज में आपसी समझ और सम्मान भी बढ़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह कदम भारत के संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुरूप होगा, जो सभी धर्मों के अनुयायियों को समान अधिकार प्रदान करता है।
उनकी यह बात समाज के विभिन्न वर्गों में एक नई चर्चा का विषय बन गई है। कई लोगों ने पंडित शास्त्री की बातों का समर्थन किया, जबकि कुछ ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। फिर भी, यह निश्चित है कि उन्होंने एक ऐसा मुद्दा उठाया है, जो भारत में धर्म, संस्कृति और समाज की संरचना पर गहरी छाप छोड़ सकता है।

