बांग्लादेश ने हाल ही में हिंदू पुजारी चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी को लेकर भारत द्वारा दिए गए बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। मंगलवार को बांग्लादेश सरकार ने एक बयान जारी कर भारत के बयान को निराधार और दोनों देशों के बीच मित्रवत् संबंधों के विपरीत बताया। यह विवाद तब उठ खड़ा हुआ जब भारत ने चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी को लेकर बांग्लादेश सरकार से सख्त सवाल उठाए थे और इस मुद्दे को मानवाधिकार उल्लंघन के तौर पर प्रस्तुत किया था।
चिन्मय कृष्ण दास, जो बांग्लादेश के एक प्रमुख हिंदू मंदिर के पुजारी थे, को कथित तौर पर 2024 की शुरुआत में बांग्लादेश पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उनके खिलाफ आरोप था कि उन्होंने सोशल मीडिया पर धार्मिक टिप्पणियां की थीं, जिन्हें बांग्लादेश में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के तौर पर देखा गया था। भारत ने इस गिरफ्तारी के बाद बांग्लादेश से उनकी तत्काल रिहाई की मांग की थी, साथ ही यह भी कहा था कि बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
बांग्लादेश सरकार ने भारत के इस बयान को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि यह न केवल तथ्यहीन है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच दोस्ताना और सहयोगपूर्ण रिश्तों के भी खिलाफ है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि बांग्लादेश में किसी भी धर्म या जाति के लोगों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जाता है, और यहां सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत को बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए और किसी भी तरह की एकतरफा टिप्पणी करने से पहले तथ्यों की जांच करनी चाहिए।
बांग्लादेश ने यह भी स्पष्ट किया कि चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा थी, जो देश की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था को बाधित करने वाले किसी भी प्रकार के भड़काऊ बयान देने के खिलाफ की गई कार्रवाई थी। सरकार के अनुसार, यह कदम बांग्लादेश की संप्रभुता और कानून के शासन का पालन करने के तहत लिया गया था। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि इस मामले में किसी भी प्रकार के धार्मिक उत्पीड़न का कोई सवाल ही नहीं है।
भारत की ओर से इस विवाद पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कुछ राजनीतिक नेताओं ने बांग्लादेश सरकार पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था। खासकर, भारत में बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के अधिकारों के संरक्षण पर चिंता जताई गई थी।

