मोदी सरकार में लगातार इस्तीफे क्यों? RBI गवर्नर से चुनाव आयोग तक, 6 बड़े अधिकारी अचानक क्यों हटे गए?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान बीते कुछ वर्षों में कई हाई-प्रोफाइल अधिकारियों के इस्तीफे ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा की है। इनमें भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), केंद्रीय सूचना आयोग (CIC), चुनाव आयोग, और नीति आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के शीर्ष पदाधिकारी शामिल हैं। सवाल यह उठता है कि क्या यह महज संयोग है, या इसके पीछे कोई गहरी संस्था-सरकार के बीच खींचतान की कहानी छुपी हुई है?
सबसे पहले बात करते हैं रघुराम राजन की, जो मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में RBI के गवर्नर थे। उन्होंने दूसरा कार्यकाल स्वीकार नहीं किया और समय से पहले ही पद छोड़ दिया। राजन ने बाद में सार्वजनिक रूप से कई मुद्दों पर सरकार से मतभेद होने की बात स्वीकारी, विशेषकर नोटबंदी और बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता को लेकर।
इसके बाद उर्जित पटेल का नाम आता है, जिन्होंने अचानक RBI गवर्नर के पद से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा उस समय आया जब सरकार और रिज़र्व बैंक के बीच कई आर्थिक मुद्दों पर तनाव बढ़ रहा था, जैसे कि केंद्रीय बैंक के रिज़र्व फंड का उपयोग और NPA को लेकर नीतियां।
अशोक लवासा, जो चुनाव आयोग में एक स्वतंत्र और सख्त छवि वाले आयुक्त माने जाते थे, ने भी समय से पहले ही पद छोड़ दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में असहमति जताई थी। जल्द ही उनके परिवार पर आयकर विभाग की जांच शुरू हो गई, और इसके बाद उन्होंने एशियाई विकास बैंक में पद स्वीकार कर लिया।
केवी चौधरी, जो कि मुख्य सतर्कता आयुक्त (CVC) थे, और सुधीर भार्गव, जो कि मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) थे — दोनों की नियुक्तियों को लेकर भी पारदर्शिता पर सवाल उठे। इन पदों पर समय से पहले इस्तीफा या अचानक निष्क्रियता भी एक पैटर्न की ओर इशारा करती है।
अरविंद पनगढ़िया, नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष, ने भी बीच कार्यकाल में निजी कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया था। लेकिन अंदरखाने की खबरों की मानें तो कुछ आर्थिक नीतियों को लेकर सरकार से उनके विचार मेल नहीं खा रहे थे।
हाल ही में राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी कुछ संवैधानिक संस्थाओं पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी कर हलचल मचा दी है, जिससे सवाल और गहराते हैं।
इन सभी मामलों से एक बात सामने आती है — सरकार और स्वतंत्र संस्थाओं के बीच सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं। जहां एक तरफ सरकार “डिसिप्लिन” और “वन नेशन, वन पॉलिसी” की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठने लगे हैं।
क्या यह केवल परिस्थितियों का संयोग है या यह एक सुनियोजित प्रक्रिया है जो संस्थानों को सरकार के अधीन लाने की कोशिश कर रही है? यह सवाल न केवल वर्तमान, बल्कि भारत के लोकतंत्र के भविष्य के लिए भी बेहद अहम है।

