राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रविवार को जिला न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली संबोधन दिया, जिसमें उन्होंने विशेष रूप से रेप मामलों में न्याय में हो रही देरी पर चिंता व्यक्त की। इस सम्मेलन का आयोजन न्यायपालिका की दक्षता और पारदर्शिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया था, और राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में कई अहम मुद्दों को उठाया।
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा, “आज हमारे समाज में न्याय की प्रक्रिया की गति में सुधार की अत्यंत आवश्यकता है, विशेषकर उन मामलों में जो सीधे मानवता और मानव अधिकारों से जुड़े हैं, जैसे कि रेप केस।” उन्होंने न्यायिक प्रक्रियाओं में देरी को समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बताया और इसे पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए अत्यधिक दर्दनाक करार दिया।
राष्ट्रपति ने महाभारत का संदर्भ देते हुए बताया कि उच्चतम न्यायालय का ध्येय वाक्य ‘यतो धर्मः ततो जयः’ का अर्थ है कि ‘जहां धर्म है, वहां विजय है।’ उन्होंने इस वाक्य के माध्यम से न्याय और धर्म के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि न्याय की प्रक्रिया में तेजी लाने से ही समाज में धर्म की विजय सुनिश्चित की जा सकती है। उनके अनुसार, यदि न्याय की प्रक्रिया में देरी होती है, तो यह केवल न्याय के लिए नहीं बल्कि समाज की संवेदनशीलता और मानवता के प्रति भी एक चुनौती है।
संबोधन के दौरान राष्ट्रपति मुर्मू ने जिला न्यायपालिका की भूमिका को भी सराहा और कहा कि जिला न्यायाधीशों का कार्य महत्वपूर्ण है क्योंकि वे न्याय की प्रक्रिया के पहले स्तर पर काम करते हैं। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों से अपील की कि वे अपनी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी और तत्परता के साथ निभाएं और सुनिश्चित करें कि न्याय की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी न हो।
राष्ट्रपति ने न्याय की पारदर्शिता और तेजी को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सुझाव भी दिए। उन्होंने सुझाव दिया कि अदालतों में मामलों की फास्ट-ट्रैकिंग की व्यवस्था लागू की जाए ताकि महत्वपूर्ण मामलों को प्राथमिकता दी जा सके। इसके अलावा, उन्होंने अदालतों में तकनीकी सुधार और डिजिटल प्रणाली के उपयोग को बढ़ावा देने की भी आवश्यकता पर बल दिया, ताकि दस्तावेज़ और प्रक्रियाएं अधिक सुलभ और प्रभावी हो सकें।
सम्मेलन में राष्ट्रपति मुर्मू ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को आम जनता के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह होना चाहिए। उन्होंने न्यायाधीशों से आग्रह किया कि वे लोगों की समस्याओं को सुनने और समझने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाएं और यह सुनिश्चित करें कि न्याय का वितरण निष्पक्ष और त्वरित हो।
राष्ट्रपति के इस संबोधन ने न्यायपालिका की विभिन्न शाखाओं और अधिकारियों को नई ऊर्जा और दिशा दी है। यह उम्मीद की जा रही है कि उनके सुझाव और विचार न्यायिक प्रणाली की कार्यप्रणाली में सुधार लाने में सहायक होंगे और न्याय की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने में योगदान देंगे।

