गुरुग्राम में राधिका यादव की हत्या से पहले पिता ने तीन दिन पहले रची साजिश, दोस्त हिमांशिका ने किया खुलासा
गुरुग्राम की रहने वाली 18 वर्षीय टेनिस खिलाड़ी राधिका यादव की हत्या ने पूरे शहर को स्तब्ध कर दिया है। इस दिल दहला देने वाली वारदात का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि राधिका की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि उसके पिता ने की। और अब इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब राधिका की करीबी दोस्त हिमांशिका ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि राधिका के पिता ने यह हत्या तीन दिन पहले ही प्लान कर ली थी।
पिता की नाराजगी बनी हत्या की वजह
हिमांशिका के अनुसार, पिछले कुछ महीनों से राधिका और उसके पिता के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था। राधिका एक उभरती हुई टेनिस खिलाड़ी थी और अपने करियर को लेकर बेहद गंभीर थी। लेकिन उसके पिता को राधिका की आधुनिक सोच, उसके दोस्तों से मेलजोल और रहन-सहन का तरीका बिल्कुल पसंद नहीं था। वे चाहते थे कि राधिका पारंपरिक जीवनशैली अपनाए और खेलकूद से दूर रहे।
हत्या की साजिश का खुलासा
हिमांशिका ने पुलिस को बताया कि घटना से तीन दिन पहले राधिका ने उसे कॉल कर बताया था कि उसके पिता काफी गुस्से में हैं और लगातार धमकी भरे शब्द बोल रहे हैं। राधिका ने यह भी कहा था कि उसे अपने ही घर में डर लगने लगा है। उसने कहा था, “मुझे लगता है कि पापा कुछ गलत कर सकते हैं।”
हिमांशिका के मुताबिक, राधिका का अंदेशा गलत नहीं था। उसके पिता ने तीन दिन पहले ही मन में हत्या की योजना बना ली थी। घटना वाले दिन, एक मामूली बात पर बहस हुई और उसी बहाने राधिका के पिता ने गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद उन्होंने शव को घर के एक कोने में छुपाने की कोशिश की।
पिता का अपराध स्वीकारना
पुलिस हिरासत में आरोपी पिता ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। उसने कहा कि उसे अफसोस है, लेकिन उस वक्त उसे लगा कि बेटी हाथ से निकल रही है और परिवार की ‘इज्जत’ खतरे में है। यह सोचकर उसने ऐसा कदम उठा लिया।
समाज के लिए बड़ा सवाल
यह मामला सिर्फ एक हत्या का नहीं है, यह उस मानसिकता की भी हत्या है जो बेटियों को अपनी पहचान और स्वतंत्रता से जीने का हक देती है। एक पिता, जो बेटी का सबसे बड़ा रक्षक होना चाहिए, वही जब उसका सबसे बड़ा अपराधी बन जाए, तो समाज के सामने गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
राधिका की मौत सिर्फ एक बच्ची की नहीं, बल्कि उस भरोसे और सपनों की मौत है, जो हर बेटी अपने घर के आंगन में देखती है। अब समय आ गया है कि ऐसे मामलों पर गंभीर सोच-विचार हो और बेटियों की सुरक्षा सिर्फ कानून नहीं, मानसिकता से भी सुनिश्चित हो।

