राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विजयादशमी के पर्व पर देश को एक जीवंत दिया संदेश – बुराई पर विजय की। वे श्री धार्मिक लीला समिति के आयोजन में भाग लेते हुए, एक दर्शनीय तीर रावण पुतले पर आधारित थे। यह दृश्य न केवल धार्मिक रस्म था, बल्कि इसमें एक गहरा सामाजिक और नैतिक अर्थ निहित था।
दिल्ली के लाल किले के पास आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मोदी ने रावण की मूर्ति के साथ तीर दागने की परंपरा को आगे बढ़ाया। समारोह की शुरुआत धूम-धड़ाके और कलाकारों को शामिल करने की हुई, जहां धरती-आकाश भी आध्यात्मिक ऊर्जा से गूंज उठी।
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने भाषण में कहा कि आज का रावण केवल अयोध्या का दुष्ट नहीं है, बल्कि वह उन शक्तियों का प्रतीक है जो आज हमारे समाज को आंतरिक और बाहरी दृश्यों से घेरते हैं – घोर व्यभिचार, कटंगता, संयोजक, एक सामाजिक विचार। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि हम आज के रावणों का सामना सामूहिक रूप से करें – न कि केवल दिखावे में, बल्कि अपने हृदय और व्यवहार में।
बारिश और मौसम की खबर के बावजूद भी जनता ने भारी संख्या में जनसमूह के रूप में कार्यक्रम स्थल को भर दिया। राष्ट्रपति ने ब्रह्मास्त्र- तीर चलाने की परंपरा को “रावण दहन” में परिवर्तित करते हुए कहा कि यह कदम केवल निश्चित प्रतिमा को स्थापित करने का नहीं, बल्कि लक्ष्य की दिशा में सकारात्मक परिवर्तन लाने का भी प्रतीक है।
इस मौके पर मोदी जी और अन्य लोग शामिल हुए थे, और उन्होंने भी उसी समारोह का हिस्सा बनकर एकता और नैतिक स्वतंत्र का संदेश दिया था। समारोह का समापन रावण की प्रतिमा दहन और “जय श्री राम” के जयकारों के बीच हुआ – यह दृश्य, श्रद्धा और सामाजिक अनूठेपन का अद्भुत संगम था।
यह आयोजन इस बात का प्रमाण देता है कि त्योहार केवल भव्यता नहीं है; वे हमारी आस्था, संस्कृति और मूल्य-चेतना के दर्पण हैं। राष्ट्रपति की भागीदारी ने इस धार्मिक जलसे को राष्ट्रीय स्तर पर एक संवाद का रूप दिया, जिसने यह आश्वासन दिया कि अंततः बुराई पर विजय प्राप्त होती है।
इस तरह, उनके इस कला-समारोह में भाग लेने की पहली आने वाली दीक्षा के लिए प्रेरणा मिलेगी – यह याद दिलाता है कि विजयदशमी केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि एक प्रेरक अवसर है जब हम अपने अंदर के रावणों को सत्य, न्याय और साहस से जोड़ सकते हैं।

