बिहार की बदहाली: लालू-नीतीश की नीतियां विफल, लेकिन असली गुनहगार हैं बीजेपी और कांग्रेस की वर्षों की अनदेखी!
बिहार एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य है, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर सामाजिक आंदोलनों तक अहम भूमिका निभाई है। लेकिन आज यह राज्य बदहाली, बेरोजगारी, पलायन, खराब शिक्षा व्यवस्था और टूटे हुए बुनियादी ढांचे का प्रतीक बन चुका है। अक्सर इस स्थिति के लिए केवल लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार को जिम्मेदार ठहराया जाता है। बेशक, इन दोनों नेताओं की नीतियों ने बिहार को अपेक्षित विकास से वंचित रखा, लेकिन अगर गहराई से विश्लेषण करें, तो असली गुनहगार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियाँ हैं, जिन्होंने दशकों तक बिहार को नजरअंदाज किया।
लालू प्रसाद यादव के शासनकाल (1990-2005) को “जंगल राज” कहा गया। कानून-व्यवस्था की हालत खराब थी, अपराध और भ्रष्टाचार चरम पर थे। विकास के नाम पर कुछ खास नहीं हुआ। लालू का राजनीतिक एजेंडा सामाजिक न्याय के नाम पर जातिगत ध्रुवीकरण तक सीमित रहा। वहीं नीतीश कुमार, जिन्होंने “सुशासन बाबू” की छवि बनाई, शुरुआती वर्षों में कुछ बदलाव जरूर लाए—सड़कें बनीं, लड़कियों को साइकिल दी गई, स्कूलों में पोशाक योजना लागू हुई। लेकिन यह विकास सतही रहा और टिकाऊ साबित नहीं हुआ। शिक्षा की गुणवत्ता गिरी, स्वास्थ्य ढांचा चरमरा गया और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर नदारद रहे।
अब सवाल यह उठता है कि जब बिहार लगातार पिछड़ता गया, तब देश की दो सबसे बड़ी पार्टियाँ—कांग्रेस और भाजपा—क्या कर रही थीं? कांग्रेस ने आज़ादी के बाद लंबे समय तक केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर शासन किया, लेकिन उसने बिहार को कभी भी प्राथमिकता नहीं दी। न तो कोई विशेष आर्थिक पैकेज मिला, न ही उद्योग स्थापित किए गए। उल्टा, केंद्र से मिलने वाले संसाधनों को नौकरशाही में लुटा दिया गया।
भाजपा भी, जो अब खुद को ‘विकास’ की प्रतीक बताती है, बिहार के साथ न्याय नहीं कर सकी। केंद्र में सत्ता में रहते हुए भी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया गया, जिसका नीतीश कुमार वर्षों से आग्रह करते रहे। न निवेश आया, न नई परियोजनाएँ। जब उत्तर प्रदेश और गुजरात में मेट्रो, एक्सप्रेसवे और उद्योग लग रहे थे, तब बिहार सिर्फ चुनावी वादों में ही चमकता रहा।
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार की बदहाली के लिए सिर्फ क्षेत्रीय नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक उदासीनता भी जिम्मेदार है। केंद्र की सरकारों ने बिहार को सिर्फ एक “वोट बैंक” के रूप में देखा। इस सोच ने बिहार के करोड़ों लोगों को गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी की दलदल में धकेल दिया।
अब समय आ गया है कि बिहार के लोग सवाल पूछें—केवल लालू या नीतीश से नहीं, बल्कि उन ताकतों से भी जिन्होंने दशकों तक उन्हें हाशिए पर रखा। विकास तभी संभव है जब राजनीतिक जवाबदेही और नीति-निर्माण में ईमानदारी हो। वरना बिहार यूँ ही पिछड़ा रहेगा और नेता चुनावी भाषणों में सपने बेचते रहेंगे।

