बिहार चुनाव 2025: छोटे दल दिखते कमजोर, मगर बिगाड़ सकते हैं नीतीश-लालू का खेल; नई सियासी बिसात बिछी
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राज्य की राजनीति में हलचल तेज़ होती जा रही है। जहां एक ओर नीतीश कुमार की जेडीयू और लालू प्रसाद यादव की राजद अपनी पुरानी राजनीतिक पकड़ को बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ छोटे राजनीतिक दल धीरे-धीरे परदे के पीछे से अपनी रणनीति को धार दे रहे हैं। ये छोटे दल भले ही दिखने में कमजोर लगें, लेकिन उनका प्रभाव क्षेत्रीय वोटबैंक पर पड़ सकता है और यही दोनों बड़े गठबंधनों का गणित बिगाड़ सकता है।
गठबंधन राजनीति की जटिलता
बिहार की राजनीति हमेशा से गठबंधन आधारित रही है। 2020 के चुनाव में भी एनडीए बनाम महागठबंधन का मुकाबला हुआ था, जिसमें एनडीए ने मामूली अंतर से बहुमत हासिल किया था। लेकिन इस बार हालात अलग हैं। जनता दल (यू) और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन टूट चुका है। नीतीश कुमार अब महागठबंधन का हिस्सा हैं, जिसमें राजद, कांग्रेस और वाम दल शामिल हैं। इस गठबंधन को मजबूत तो माना जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर छोटे दलों की मौजूदगी इसका समीकरण बिगाड़ सकती है।
कौन हैं ये छोटे लेकिन असरदार दल?
कुछ छोटे दल जैसे कि विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी), जन अधिकार पार्टी (पप्पू यादव), हम (जीतन राम मांझी), एसडीपीआई और एआईएमआईएम जैसे संगठन सीमित क्षेत्रों में अच्छी पकड़ रखते हैं। भले ही ये दल पूरे राज्य में प्रभावी न हों, लेकिन इनका असर कुछ सीटों पर निर्णायक हो सकता है।
उदाहरण: सीमांचल क्षेत्र में एआईएमआईएम का अच्छा असर है। 2020 में इस पार्टी ने 5 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया था। वहीं, कुशवाहा और निषाद समुदायों में वीआईपी और आरएलएसपी जैसे दलों का असर रहा है। अगर इन दलों ने निर्दलीय या तीसरे मोर्चे के रूप में चुनाव लड़ा, तो महागठबंधन और एनडीए दोनों का वोट बैंक प्रभावित हो सकता है।
वोट कटवा या विकल्प?
बड़ी पार्टियां अक्सर इन छोटे दलों को ‘वोट कटवा’ कहकर खारिज कर देती हैं, लेकिन इनका अस्तित्व कहीं न कहीं जनता में विकल्प की तलाश का संकेत भी है। युवाओं और नए मतदाताओं के बीच इन दलों का बढ़ता संवाद और डिजिटल माध्यमों पर सक्रियता यह दिखाती है कि ये सिर्फ पीछे बैठने वाले खिलाड़ी नहीं हैं।
रणनीति में बदलाव ज़रूरी
नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव जैसे दिग्गज नेताओं को अब केवल अपने परंपरागत वोटबैंक पर भरोसा करने की बजाय जमीनी समीकरणों को नए सिरे से समझने की ज़रूरत है। अगर इन छोटे दलों के साथ बातचीत और सीट बंटवारे की रणनीति नहीं बनाई गई, तो 2025 का चुनाव अप्रत्याशित नतीजे दे सकता है।
निष्कर्ष:
बिहार चुनाव 2025 सिर्फ दो ध्रुवों के बीच नहीं होगा। छोटे दल भले ही संख्या में कम दिखें, लेकिन वे वोटबैंक में सेंध लगाकर ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सकते हैं। राजनीतिक बिसात पर मोहरे फिर से बिछाए जा रहे हैं — अब देखना है कि कौन सी चाल किसे मात देती है।

