राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षों की गौरवशाली यात्रा पर जारी हुआ ऐतिहासिक सिक्का, डाक टिकट और स्मारक

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100वीं गौरवशाली यात्रा का विमोचन ऐतिहासिक स्मारक, डाक टिकट और स्मारक हुआ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के 100 साल पूरे होने पर भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए एक विशेष स्मृति चिह्न के रूप में 100 रुपये का नोट , एक डाक टिकट और एक स्मारक जारी किया है। यह आयोजन न केवल संघ की सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रनिर्माण में भूमिका का सम्मान है, बल्कि भारत के आत्मबोध और गौरव का भी प्रतीक है।

इस विशेष 100 रुपये के सिक्कों की सबसे खास बात यह है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार भारतीय मुद्रा पर भारत माता की छवि अंकित है । सिक्कों में से एक भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ है, जो भारत की संप्रभुता और सांस्कृतिक मुद्रा का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर सिंह के साथ वरद मुद्रा में भारत माता की भव्य छवि अंकित है। यह छवि केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की रक्षा, शक्ति और करुणा का भी प्रतीक है।

इस भव्य सिक्के पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बोध वाक्य भी अंकित है – “राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम।” यह वाक्य संघ के सिद्धांत और कार्यशैली को संक्षेप में प्रस्तुत करता है। इसका अर्थ है – “यह राष्ट्र के लिए समर्पित है, यह मेरा नहीं है, यह राष्ट्र का है।” यह भाव ही स्वयंसेवकों की प्रेरणा का मूल है, जिसमें निजी स्वार्थ नहीं, केवल राष्ट्र सेवा का संकल्प होता है।

इसके साथ ही, भारत सरकार द्वारा एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया गया है जो कि संघ की शताब्दी यात्रा के प्रतीक के रूप में कार्य करेगा। इस पुस्तक में संघ की स्थापना से लेकर वर्तमान तक की प्रमुख यादें, योगदान और सेवाओं का उल्लेख किया गया है। यह डाक टिकट केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि संघ के साक्ष्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है।

इसके अतिरिक्त, एक ऐतिहासिक स्मारक (स्मारक स्मारक) का अनावरण भी किया गया है, जो संघ के 100 वर्षों के योगदान की झलक प्रस्तुत करता है। इस स्मारक में संघ के संस्थापक डॉ. के. बी. हेडगेवार, गुरुजी गोलवलकर और अन्य प्रमुख व्यक्तियों के विचार, समाज सेवा के कार्य और संघ की अनुशासित समिति संरचना को प्रकाशित किया गया है।

यह संस्था पत्रिका में व्यापक उत्साह और गौरव का विषय बनी। विभिन्न शहरों और प्रांतों में संघ के वकील, छात्र, इंजीनियर और आम नागरिकों ने इसका प्रथम स्वागत किया। प्रधानमंत्री, दिशा निर्देश और अन्य कट्टरपंथी लोगों ने इस ऐतिहासिक क्षण पर अपने विचार साझा करते हुए इसे “भारत की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना में एक महत्वपूर्ण कदम” बताया।

संघ के 100वें वर्ष में केवल एक संगठन की यात्रा नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक पुनर्निर्माण, सांस्कृतिक संगठन और राष्ट्र के प्रतिपादक महाकाव्यों की गाथा है। यह ऐतिहासिक स्मारक, डाक टिकट और स्मारक आने वाली निशानियों को संदेश देता है कि राष्ट्र सर्वोपरि है और उसकी सेवा ही सच्चा धर्म है।


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