जंतर मंतर विरोध में दिल्ली पुलिस ने उन्नत निगरानी तैनात की, चेहरे पहचान तकनीक से निजता और नैतिकता पर सवाल
नई दिल्ली, 25 जुलाई 2026 — राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर विरोध में दिल्ली पुलिस की उन्नत निगरानी
नई दिल्ली, 25 जुलाई 2026 — जंतर मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच दिल्ली पुलिस ने उन्नत निगरानी तकनीक तैनात की है। इसमें चेहरे पहचानने वाली फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (FRT) और हाई-डेफिनिशन कैमरे शामिल हैं। इस कदम ने निजता और नैतिकता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
निगरानी व्यवस्था
- पुलिस ने जंतर मंतर और आसपास के इलाकों में सैकड़ों CCTV कैमरे लगाए हैं।
- कैमरों को फेशियल रिकग्निशन सिस्टम से जोड़ा गया है, जिससे भीड़ में मौजूद व्यक्तियों की पहचान तुरंत की जा सकती है।
- अधिकारियों का कहना है कि यह व्यवस्था कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित हिंसा रोकने के लिए की गई है।
निजता पर सवाल
- मानवाधिकार कार्यकर्ता का कहना है कि इस तकनीक का इस्तेमाल नागरिकों की स्वतंत्रता और निजता का उल्लंघन है।
- कई संगठनों ने चेतावनी दी है कि बिना सहमति के चेहरे की पहचान करना संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
- विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत में अभी तक डेटा संरक्षण कानून पूरी तरह लागू नहीं हुआ है, जिससे दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है।
नैतिक बहस
- तकनीकी विशेषज्ञ मानते हैं कि FRT का उपयोग केवल सीमित और पारदर्शी परिस्थितियों में होना चाहिए।
- विरोध प्रदर्शन जैसे लोकतांत्रिक गतिविधियों में निगरानी करना लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर कर सकता है।
- आलोचकों का कहना है कि यह कदम नागरिकों को डराने और आंदोलन को दबाने की कोशिश हो सकती है।
पुलिस का पक्ष
- दिल्ली पुलिस का दावा है कि निगरानी का उद्देश्य केवल सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
- अधिकारियों ने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल हिंसक तत्वों की पहचान और भीड़ नियंत्रण के लिए किया जा रहा है।
- पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि डेटा का उपयोग केवल कानूनी प्रक्रिया के तहत होगा।
नागरिकों की प्रतिक्रिया
- प्रदर्शनकारियों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्हें लगातार निगरानी में रहने का डर है।
- कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या सरकार नागरिकों की आवाज दबाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल कर रही है।
- कुछ ने इसे “डिजिटल पुलिसिंग” करार दिया और कहा कि इससे लोकतांत्रिक माहौल प्रभावित होगा।
निष्कर्ष
जंतर मंतर पर तैनात उन्नत निगरानी तकनीक ने सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन की बहस को फिर से जीवित कर दिया है। जहां पुलिस इसे सुरक्षा उपाय बता रही है, वहीं नागरिक समाज इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला मान रहा है।

