साहित्य क्षेत्र में अद्वितीय योगदान हेतु राष्ट्रपति मुर्मू ने पद्म विभूषण रामभद्राचार्य जी को ज्ञानपीठ सम्मान प्रदान किया।

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राष्ट्रपति मुर्मू ने ज्ञानपीठ विजेताओं को सराहा, कहा- साहित्यिक योगदान समाज को दिशा देने वाला प्रेरणास्रोत है

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में आयोजित एक गरिमामयी समारोह में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकारों को हार्दिक बधाई दी और उनके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज को दिशा देने वाला एक शक्तिशाली उपकरण है। एक सशक्त और संवेदनशील समाज के निर्माण में साहित्यकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भारत के साहित्यिक जगत का सर्वोच्च सम्मान है, जो वर्षों से उन लेखकों को दिया जा रहा है, जिन्होंने अपनी रचनात्मकता, विचारशीलता और सामाजिक सरोकारों से साहित्य को समृद्ध किया है। उन्होंने यह भी कहा कि भाषा, संस्कृति और साहित्य किसी भी सभ्यता की आत्मा होते हैं, और साहित्यकार इस आत्मा को जीवंत बनाए रखते हैं।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आज के डिजिटल युग में जहाँ सूचना का प्रवाह अत्यंत तेज़ हो गया है, वहाँ साहित्य का महत्व और भी बढ़ गया है। साहित्य हमें ठहरकर सोचने, समझने और मानवीय मूल्यों को आत्मसात करने की प्रेरणा देता है। ऐसे समय में जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है — जैसे सामाजिक असमानता, सांप्रदायिकता, नैतिक पतन आदि — साहित्यकारों की लेखनी इन समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

राष्ट्रपति ने ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेताओं के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके लेखन में न केवल भाषा की सुंदरता है, बल्कि उसमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी झलकती है। उन्होंने कहा कि इन साहित्यकारों ने न केवल शब्दों के माध्यम से संवेदनाओं को व्यक्त किया है, बल्कि अपने विचारों से पाठकों को सोचने के लिए प्रेरित भी किया है।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने युवाओं से भी अपील की कि वे साहित्य पढ़ने और समझने की आदत विकसित करें। उन्होंने कहा कि साहित्य न केवल भाषा को समृद्ध करता है, बल्कि यह व्यक्तित्व को भी निखारता है। जब युवा साहित्य से जुड़ते हैं, तो वे इतिहास, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के प्रति अधिक संवेदनशील बनते हैं।

कार्यक्रम में देशभर से अनेक साहित्यकार, शिक्षाविद, और संस्कृति प्रेमी उपस्थित थे। सभी ने राष्ट्रपति के विचारों की सराहना की और इस बात पर सहमति जताई कि साहित्य की शक्ति को नए युग में भी बनाए रखने की ज़रूरत है।

राष्ट्रपति मुर्मू के इस संबोधन ने न केवल पुरस्कार विजेताओं को प्रोत्साहित किया, बल्कि समूचे साहित्यिक जगत को एक नई ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान की। उनका यह संदेश आने वाली पीढ़ियों को भी यह समझाने में सहायक होगा कि साहित्य समाज की आत्मा है और साहित्यकार उसके सजग प्रहरी।


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