जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने कहा – ऑपरेशन सिंदूर वेद मंत्र से प्रेरित, शत्रु को समूल नष्ट करना धर्म का संकेत
प्रख्यात संत, विद्वान, भाष्यकार और पद्म विभूषण से सम्मानित जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी ने हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर एक महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया, जिसने राष्ट्रभक्ति और धार्मिक विचारों के बीच एक गहरा संबंध स्थापित किया। उन्होंने कहा कि यह सैन्य कार्रवाई केवल एक रणनीतिक कदम नहीं था, बल्कि इसका आध्यात्मिक आधार वेदों में निहित है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “ऑपरेशन सिंदूर” उस वैदिक मंत्र से प्रेरित है, जिसका भावार्थ है — “जो हमें मारना चाहे, उसे समूल नष्ट कर देना चाहिए।”
रामभद्राचार्य जी ने अपने संबोधन में बताया कि भारत की सनातन परंपरा केवल सहिष्णुता और अहिंसा की शिक्षा नहीं देती, बल्कि जब धर्म, राष्ट्र और समाज पर संकट आता है, तब शत्रु के विनाश को भी धर्मसम्मत माना जाता है। उन्होंने कहा कि वेद केवल आध्यात्मिक ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि युद्धनीति, कर्तव्य और न्याय के गहन सिद्धांतों का भी भंडार हैं। उन्होंने विशेष रूप से ऋग्वेद के उन मंत्रों का उल्लेख किया जो अन्याय और आक्रमण के विरुद्ध निर्णायक प्रतिक्रिया देने की प्रेरणा देते हैं।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने भारतीय सेना की बहादुरी और ऑपरेशन सिंदूर की सफलता की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह अभियान न केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन था, बल्कि एक वैदिक सिद्धांत की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति भी थी। उन्होंने कहा, “जब राष्ट्र पर संकट आता है, तो केवल तलवार नहीं, विचार भी धारदार होने चाहिए। ऑपरेशन सिंदूर ने यह प्रमाणित कर दिया कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया नहीं करता, बल्कि आवश्यक होने पर निर्णायक प्रहार भी करता है।”
उन्होंने यह भी बताया कि धर्म का सही स्वरूप केवल पूजा, उपासना या त्याग नहीं है, बल्कि अधर्म के विनाश में भी धर्म की ही प्रतिष्ठा है। उनका यह संदेश था कि जब देश और धर्म पर संकट हो, तब सहिष्णुता के साथ-साथ प्रतिकार भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि महाभारत, रामायण और वेदों से लेकर आधुनिक भारत तक, शत्रु के समूल नाश की परंपरा को धर्म का अंग माना गया है।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में साधु-संत, धर्माचार्य, बुद्धिजीवी और राष्ट्रप्रेमी नागरिक उपस्थित थे। सभी ने रामभद्राचार्य जी के विचारों को गंभीरता से सुना और उनके राष्ट्रवादी दृष्टिकोण की सराहना की।
रामभद्राचार्य जी के इस वक्तव्य ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की आध्यात्मिक चेतना केवल ध्यान और भक्ति में ही सीमित नहीं, बल्कि जब बात मातृभूमि की रक्षा की हो, तो वेद भी शस्त्र उठाने की आज्ञा देते हैं। यह विचार आज के भारत को एक संतुलित, सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र की दिशा में प्रेरित करता है – जहाँ धर्म और देशभक्ति साथ चलते हैं।

