सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: हरीश राणा को मिली पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति
नई दिल्ली, 12 मार्च 2026 – भारत में इच्छामृत्यु से जुड़ा एक ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दी है। राणा पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे और वेंटिलेटर व अन्य लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर थे। अदालत ने पहली बार किसी मरीज के लिए लाइफ सपोर्ट हटाने की मंजूरी दी है, जिससे यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि लंबे समय से कोमा में रह रहे मरीज की गरिमा और परिवार की इच्छा को ध्यान में रखते हुए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल विशेष परिस्थितियों में लिया गया है और इसे सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए।
क्या है पैसिव यूथेनेशिया? पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ है मरीज को दी जा रही कृत्रिम जीवनरक्षक सुविधाओं को हटाना, जैसे वेंटिलेटर, दवाइयाँ या अन्य उपकरण। इसमें मरीज को सक्रिय रूप से मृत्यु नहीं दी जाती, बल्कि प्राकृतिक रूप से जीवन समाप्त होने दिया जाता है। भारत में यह पहली बार है जब अदालत ने इस तरह की अनुमति दी है।
भारत में इच्छामृत्यु के नियम 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को सशर्त वैधता दी थी। अदालत ने कहा था कि यदि कोई मरीज लंबे समय से कोमा या वेजिटेटिव स्टेट में है और उसके परिवारजन या अभिभावक इच्छामृत्यु की मांग करते हैं, तो मेडिकल बोर्ड की सिफारिश और अदालत की अनुमति के बाद ही यह संभव होगा। इस प्रक्रिया में मरीज की गरिमा और मानवाधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
हरीश राणा का मामला गाजियाबाद निवासी हरीश राणा 13 साल पहले एक गंभीर दुर्घटना का शिकार हुए थे। तब से वे लगातार कोमा में थे और जीवनरक्षक उपकरणों पर निर्भर थे। परिवार ने वर्षों तक इलाज जारी रखा, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। अंततः उन्होंने अदालत से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और परिवार की भावनाओं को देखते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
प्रतिक्रिया और महत्व इस फैसले ने देशभर में इच्छामृत्यु पर नई बहस छेड़ दी है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह मानव गरिमा और परिवार की भावनाओं का सम्मान करने वाला कदम है। वहीं, कई लोग इसे नैतिक और धार्मिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण मानते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों के लिए मिसाल बनेगा। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि हर मामले की समीक्षा अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर की जाएगी।
निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी और नैतिक पहलुओं को नई दिशा देता है। हरीश राणा का मामला न केवल न्यायिक इतिहास में दर्ज होगा, बल्कि यह समाज को भी यह सोचने पर मजबूर करेगा कि जीवन और मृत्यु के अधिकारों को किस तरह संतुलित किया जाए।

