हमेशा विवादित रहा आरोपी: 2021 में TMC से निकाला गया, फिर भी नियमों को दरकिनार कर कॉलेज में प्रवेश
कोलकाता में हुए हालिया सामूहिक दुष्कर्म के मामले ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। इस गंभीर अपराध का मुख्य आरोपी न केवल पहले से ही आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त था, बल्कि उसके अतीत को देखते हुए यह सवाल उठता है कि उसे इतनी आसानी से संस्थानों और राजनीतिक संगठनों में प्रवेश क्यों मिलता रहा।
जानकारी के अनुसार, यह आरोपी पहले पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का सक्रिय सदस्य रह चुका है। हालांकि, उसकी लगातार विवादास्पद गतिविधियों और हिंसक व्यवहार के कारण पार्टी ने उसे वर्ष 2021 में निष्कासित कर दिया था। पार्टी के सूत्रों ने पुष्टि की है कि आरोपी को “हमेशा से troublemaker” यानी झगड़ालू और असामाजिक माना जाता था। वह पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा रहा था, इसलिए उसे बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा।
परन्तु हैरानी की बात यह है कि TMC से निष्कासन के बावजूद आरोपी को एक प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेज में दाख़िला मिल गया — वह भी तब जब सीटों की संख्या पहले ही पूरी हो चुकी थी। सवाल यह उठता है कि जब कॉलेज में सीटें सीमित थीं, तो उसे कैसे प्रवेश मिला? क्या उसके पास किसी तरह का राजनीतिक दबाव या सिफारिश थी? क्या यह एक संस्थागत लापरवाही का मामला है या फिर जानबूझकर उसे फायदा पहुँचाया गया?
कॉलेज प्रशासन इस विषय पर कोई स्पष्ट जवाब देने से बच रहा है। जब मीडिया ने कॉलेज अधिकारियों से इस अनियमितता पर सवाल किए, तो उन्होंने कोई ठोस उत्तर नहीं दिया और मामले को उच्च स्तर पर विचाराधीन बता कर टाल दिया। वहीं छात्र संघ के कुछ सदस्यों ने बताया कि आरोपी पहले भी कॉलेज में कई बार झगड़े, दुर्व्यवहार और डराने-धमकाने की घटनाओं में शामिल रहा है। फिर भी प्रशासन ने उसके विरुद्ध कोई कड़ा कदम नहीं उठाया।
यह मामला राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। यदि किसी व्यक्ति का अतीत इतना विवादास्पद हो, और उसके खिलाफ शिकायतें पहले से हों, तो उसके खिलाफ उचित कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? क्यों ऐसे लोगों को बार-बार संस्थागत समर्थन मिलता है?
अब जब आरोपी एक जघन्य अपराध में संलिप्त पाया गया है, तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि क्या यह अपराध टाला जा सकता था, अगर समय रहते प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर सख्त कदम उठाए जाते?
यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि प्रणालीगत विफलताओं की एक श्रृंखला को दर्शाती है। जब तक संस्थाएं व्यक्तिगत प्रभाव, राजनीतिक दबाव और सिफारिशों से ऊपर उठकर निष्पक्ष निर्णय नहीं लेंगी, तब तक ऐसे मामले दोहराए जाते रहेंगे।
समाज और शासन दोनों को यह सोचना होगा कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। कानून, शिक्षा और राजनीति के बीच की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं। इस मामले से यह साफ है कि यदि सिस्टम में गड़बड़ियां समय पर नहीं सुधारी गईं, तो इसके दुष्परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं।

