20 रुपये में इलाज करने वाले पद्मश्री डॉक्टर एमसी डाबर नहीं रहे: सेवा, सादगी और समर्पण की मिसाल बने जीवन की कहानी
भारत ने एक महान चिकित्सक और मानवता के सच्चे सेवक को खो दिया है। पद्मश्री डॉ. एमसी डाबर, जिन्होंने चिकित्सा सेवा को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम माना, अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने शनिवार सुबह 4 बजे अपने निवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन से चिकित्सा और समाज सेवा जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
डॉ. डाबर का जीवन ऐसे समय में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है, जब चिकित्सा सेवा अक्सर व्यावसायिक हो गई है। वे अपने इलाज की बेहद सस्ती फीस और अनोखे कार्यशैली के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध थे। जहां आज सामान्य चिकित्सक की फीस सैकड़ों या हजारों में होती है, वहीं डॉ. डाबर ने अपना सेवा कार्य मात्र 2 रुपये से शुरू किया था। वर्षों तक उन्होंने इसी फीस पर इलाज किया, और बाद में भी अधिकतम 20 रुपये में लोगों को राहत दी। यह फीस उन्होंने केवल प्रतीक रूप में रखी थी, ताकि मरीजों को आत्मसम्मान बना रहे, लेकिन उन पर आर्थिक बोझ न पड़े।
उनका मानना था कि “बीमारी गरीब को और गरीब बना देती है, इसलिए इलाज सस्ता होना चाहिए, ताकि हर वर्ग तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच सकें।”
1972 से शुरू किया सेवा का सफर
डॉ. डाबर ने 1972 में अपने चिकित्सा जीवन की शुरुआत की थी। उन्होंने कभी भी बड़े अस्पतालों या आलीशान क्लीनिक की तलाश नहीं की। उनका क्लिनिक सादा था, लेकिन वहां मिलने वाली सेवा, सच्ची समर्पण भावना से परिपूर्ण थी। उनके यहां इलाज के लिए अमीर-गरीब, जाति-धर्म का कोई भेद नहीं था।
उनके पास आने वाला हर मरीज सिर्फ “मरीज” था, जिसे राहत की जरूरत थी। वे बिना किसी दिखावे के, केवल अपने अनुभव, ज्ञान और करुणा से लोगों का इलाज करते थे।
पद्मश्री सम्मान
सरकार ने उनके इस अद्भुत समर्पण को सम्मानित करते हुए उन्हें 2019 में पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़ा। यह न केवल उनके लिए बल्कि उन हजारों मरीजों के लिए भी गर्व का क्षण था, जिनकी जिंदगी उन्होंने बेहतर बनाई थी।
अंतिम सांस तक सेवा
डॉ. डाबर ने अंतिम समय तक मरीजों को देखना बंद नहीं किया। उम्र और स्वास्थ्य की कमजोरी के बावजूद वे प्रतिदिन मरीजों को देखते रहे। उनका जीवन इस बात का प्रतीक रहा कि असली डॉक्टर वही होता है जो सेवा को धर्म माने और मरीज को भगवान।
निष्कर्ष
डॉ. एमसी डाबर का जीवन सच्ची सेवा, सादगी और समर्पण की मिसाल है। उन्होंने दिखाया कि जब नीयत साफ हो और उद्देश्य समाजहित में हो, तो एक व्यक्ति भी लाखों की जिंदगी बदल सकता है। उनके जाने से भले ही एक युग का अंत हो गया हो, लेकिन उनकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को सही राह दिखाती रहेगी।
उनकी यादें, आदर्श और सेवा की भावना हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगी।

