इतिहास के पन्नों से: जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार मिले थे राष्ट्रपति पुतिन से
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच की घनिष्ठ मित्रता किसी से छिपी नहीं है। दोनों नेताओं ने दशकों से दोनों देशों के संबंधों को नई ऊँचाई दी है। लेकिन उनकी यह दोस्ती और रणनीतिक साझेदारी आज से नहीं, बल्कि लगभग 25 साल पहले शुरू हुई थी, जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री थे।
यह ऐतिहासिक मुलाकात वर्ष 2001 की है। उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने शुरुआती दौर में थे। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में आयोजित भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए रूस की राजधानी मॉस्को जाने का अवसर मिला था। यह वह समय था जब व्लादिमीर पुतिन रूस के शक्तिशाली राष्ट्रपति के रूप में अपनी धाक जमा चुके थे।
2001: मॉस्को में पहली झलक
2001 में हुई इस मुलाकात की एक दुर्लभ और ऐतिहासिक तस्वीर आज भी दोनों नेताओं के बीच लंबी साझेदारी की गवाह है। तस्वीर में, युवा और ऊर्जावान नरेंद्र मोदी को मॉस्को में रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के साथ खड़ा देखा जा सकता है। हालाँकि, उस समय नरेंद्र मोदी की भूमिका प्रतिनिधिमंडल के सदस्य की थी, लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि भविष्य में ये दोनों नेता विश्व मंच पर एक साथ खड़े होकर भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी की दिशा तय करेंगे।
यह यात्रा भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी, क्योंकि यह शीत युद्ध के बाद के दौर में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम था। इस शिखर सम्मेलन ने रक्षा, ऊर्जा और तकनीकी सहयोग के क्षेत्रों में दोनों देशों के लिए मजबूत नींव रखी।
CM से PM तक: दोस्ती का सफर
मुख्यमंत्री के रूप में अपनी शुरुआती अंतरराष्ट्रीय यात्राओं में से एक में पुतिन से मिलना, मोदी की दूरदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में उनकी रुचि को दर्शाता है। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद, नरेंद्र मोदी ने इस पुरानी नींव पर एक मजबूत इमारत खड़ी की।
आज, जब राष्ट्रपति पुतिन एक बार फिर भारत के आधिकारिक दौरे पर आ रहे हैं, तो 2001 की वह तस्वीर और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह तस्वीर न केवल दोनों नेताओं की व्यक्तिगत यात्रा को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि भारत-रूस की दोस्ती किसी एक सरकार या नेता पर निर्भर नहीं है; यह एक समय की कसौटी पर खरी उतरी, गहरी और अटूट रणनीतिक साझेदारी है, जिसने दोनों देशों के लोगों को अत्यधिक लाभ पहुँचाया है।
यह ऐतिहासिक तस्वीर और कहानी आज के दौर में द्विपक्षीय संबंधों के अध्ययन और कूटनीतिक इतिहास के शौकीनों के लिए एक मूल्यवान दस्तावेज है।

